
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय। हरे कृष्णा!
हम सभी इंसान हैं और जीवन की भागदौड़ में हमसे जाने-अनजाने कई ऐसी गलतियां या पाप हो जाते हैं, जिनका बोझ हमारे मन पर रहता है। शास्त्रों में एक ऐसी तिथि बताई गई है जो इन सभी पापों के बोझ को उतारने की शक्ति रखती है—इसे हम ‘पापमोचनी एकादशी’ कहते हैं।
इस साल 2026 में यह एकादशी बेहद खास है, क्योंकि इस दिन भगवान विष्णु की कृपा के साथ-साथ सूर्य देव का ‘मीन संक्रांति’ आशीर्वाद भी मिल रहा है।
14 या 15 मार्च: व्रत कब रखें?
इस साल एकादशी तिथि को लेकर थोड़ा असमंजस हो सकता है। पंचांग के अनुसार:
- तिथि प्रारंभ: 14 मार्च (शनिवार) सुबह 8:12 बजे।
- तिथि समाप्त: 15 मार्च (रविवार) सुबह 9:16 बजे।
Astrologic.tv की सलाह: चूंकि 14 मार्च को दशमी युक्त एकादशी है, जिसे शास्त्रों में ‘विद्धा एकादशी’ माना जाता है। शुद्ध और उदय तिथि के नियमों के अनुसार, 15 मार्च (रविवार) को व्रत रखना ही सर्वश्रेष्ठ और शास्त्र सम्मत है।
मीन संक्रांति का दुर्लभ महासंयोग
15 मार्च को ही सूर्य देव अपनी राशि बदलकर मीन राशि में प्रवेश कर रहे हैं। एकादशी और संक्रांति का एक ही दिन पड़ना बहुत पुण्यदायी माना जाता है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा के साथ-साथ पितरों के निमित्त दान और तर्पण करने से सात पीढ़ियों को तृप्ति मिलती है।
- पुण्य काल: सुबह 6:31 से दोपहर 12:30 तक।
- महापुण्य काल: सुबह 6:31 से 8:31 तक। (यह समय दान के लिए सबसे शुभ है)
पापमोचनी एकादशी व्रत कथा (संक्षेप में)
पौराणिक कथा के अनुसार, मेधावी ऋषि अपनी तपस्या के दौरान मंजुघोषा अप्सरा के मोह में पड़ गए थे। 57 वर्षों तक तपस्या भंग रहने के बाद जब उन्हें आत्मज्ञान हुआ, तो उन्होंने अप्सरा को पिशाचिनी होने का श्राप दे दिया। बाद में च्यवन ऋषि के निर्देश पर, मेधावी ऋषि और मंजुघोषा दोनों ने चैत्र मास की ‘पापमोचनी एकादशी’ का व्रत किया। इस व्रत के प्रभाव से अप्सरा श्राप मुक्त हुई और ऋषि के भी सभी पाप धुल गए।
पूजा के शुभ मुहूर्त (15 मार्च)
- ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 5:02 से 5:50 तक।
- प्रातः पूजा समय: सुबह 5:19 से 6:31 तक।
- सायंकाल पूजा: शाम 6:27 से 7:41 तक।
विशेष नियम: रविवार का दिन होने के कारण एकादशी पर तुलसी के पौधे में जल न चढ़ाएं (शास्त्रों में रविवार को तुलसी स्पर्श वर्जित है)। हालांकि, आप तुलसी जी के पास शुद्ध घी का दीपक अवश्य जला सकते हैं।
पारण का समय (16 मार्च, सोमवार)
व्रत का पूरा फल तभी मिलता है जब उसका पारण (व्रत खोलना) सही समय पर किया जाए। सोमवार को सर्वार्थ सिद्धि योग भी बन रहा है।
- पारण का समय: सुबह 6:30 से 8:54 के बीच।
सावधानी: पारण करने से पहले किसी ब्राह्मण को दान दें या सात्विक भोजन कराएं। पारण हमेशा द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले ही कर लेना चाहिए।
चलते-चलते: ध्यान रखने योग्य बातें
अगर आप अनजाने में शनिवार (14 मार्च) को व्रत शुरू कर चुके हैं, तो ध्यान रखें कि रविवार को ‘हरिवासर’ के कारण दोपहर बाद ही पारण संभव होगा। लेकिन श्रेष्ठ फल के लिए रविवार का व्रत ही उत्तम है।
भगवान विष्णु आपकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करें और आपके जीवन से दुखों का नाश हो।
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